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भोजन करते समय
September 11, 2018 • Tarun Kumar Nimesh

पूनम शर्मा
शरीर को स्वस्थ रखने और कार्य करने हेतु ऊर्जा पाने के लिए भोजन करना आवश्यक है, जिसे सभी जीव नियमित रूप से ग्रहण करते हैं। मुख्य रूप से भोजन के दो प्रकार होते हैं-एक शरीर को सुरक्षा प्रदान करने वाला तथा दूसरा ऊर्जा प्रदान करने वाला। दोनों ही प्रकार का भोजन हमारे शरीर के लिए आवश्यक है।
हम सब भोजन तो करते हैं किंतु भोजन करने संबंधी विविध नियमों को हम नहीं जानते और जितना जानते भी हैं, उसे सुचारू रूप से क्रियात्मक रूप नहीं दे पाते हैं या यूं कह लें कि इन विविध नियमों को हम अपने व्यवहार में नहीं उतार पाते या उतारने में लापरवाही करते हैं।
हमारे प्राचीन ग्रंथों तथा औषधि शास्त्रों के अनुसार भी भोजन करते समय विविध नियम निर्धारित किये गये हैं, जिसका पालन सभी को करना चाहिए तथा इसका उल्लंघन करने से कई बार हम विभिन्न प्रकार की मुसीबतों में फंस जाते हैं, जैसे सामान्य तौर पर कहा जाता है कि भोजन करते समय बात नहीं करनी चाहिए। इसे कई लोग सामान्य रूप में ले लेते हैं और इसका पालन नहीं करते किंतु भोजन करते समय बात न करने के पीछे वैज्ञानिक तर्क हैं।
आप जानते होंगे कि हमारे गले में कंठ के नीचे दो नली होती हैं-एक श्वास नली और दूसरी भोजन नली तथा उसके ऊपर जीभ के समान एक रचना लगी रहती है, जिसे अभिकाकल या स्वरयंत्र मुख आवरण कहते हैं, जो भोजन करते समय श्वास नली को ढककर भोजन को भोजन नली में जाने का मार्ग देता है। इसके खुले रहने से भोजन के कण श्वास नली में आ सकते हैं जिससे बेचैनी होने लगती है और हिचकी आनी शुरू हो जाती है। कभी-कभी जल्दी-जल्दी खाने से भी यही स्थिति उत्पन्न हो जाती है। बात करते समय श्वास नली खुली रहती है, अतः बात करते हुए भोजन करने से कभी-कभी परेशानी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
यही स्थिति जल्दी-जल्दी खाने में भी है और इस तरह भोजन करने से भोजन के कण ठीक से बारीक भी नहीं हो पाते हैं और वह सीधे आमाशय में चला जाता है जिससे उसका पाचन भी ठीक से नहीं हो पाता और होता भी है तो काफी समय लगता है और आमाशय पर इसका भार भी पड़ता है। स्वाभाविक है कि भोजन चबाने का काम दांतों का है और हम दांतों से न चबाकर हड़बड़ी में निगल जाते हैं जिसकी सजा बेचारे आमाशय और आंत तथा लिवर को भुगतनी पड़ती है।
भोजन करते समय एक और बात ध्यान रखने की है। बहुत से लोगों की यह आदत होती है कि वे भोजन करते समय टी. वी., टेप अथवा अन्य मनोरंजन के साधनों का प्रयोग करते हैं जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। भोजन करते समय मन में एकाग्रता तथा शुद्ध भाव होना चाहिए और भोजन इस भाव से करना चाहिए कि अन्तर्मन में बैठे अपने परमात्मा को भोग लगा रहे हों क्योंकि ईश्वर कण-कण में निवास करता है। इससे लाभ यह होता है कि थोड़ी देर के लिए ही सही, हम शांत, एकाग्र और मौन रहते हैं जिसका प्रभाव हमारे शरीर के साथ-साथ अंतर्मन पर भी पड़ता है।
अतः हम देखते हैं कि भोजन करने संबंधी कई छोटे-छोटे किंतु महत्त्वपूर्ण नियम हैं जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं किंतु इनका सही ढंग से पालन करने पर हमें बहुत लाभ मिल सकता है। एक बात का और ध्यान रखना चाहिए कि भोजन के पूर्व पंच-स्नान अवश्य करना चाहिए अर्थात् पांचों अंगों - दोनों हाथ, दोनों पैर तथा मुंह को धोना चाहिए। तत्पश्चात् भोजन करने हेतु आसन पर बैठें।