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चंबा की घाटी पर्यटकों को करती आकर्षित
February 24, 2019 • Udai Ram

हिमाचल प्रदेश में बसा एक खूबसूरत स्थान है चंबा। इस नगरी से मुझे बहुत लगाव रहा है इसीलिए हर वर्ष जुलाई -अगस्त में जब वहाँ मिंजर मेला लगता था, मैं कुछ दिनों के लिए वहीं रहता था। चंबा जाने के लिए दिल्ली से रेल द्वारा चक्की बैंक, पठानकोट, पठानकोट से घुमावदार पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए बस आगे बढ़ती है तो प्रकृति के दृश्यों का नजारा देखने को मिलता है। मनोरम पर्यटन स्थली, मंदिरों की नगरी, कला नगरी आदि नामों से मशहूर चंबा रावी नदी के तट पर बसा है।
मेरा अनुमान है कि इस धरती की नैसर्गिक खूबसूरती और यहाँ की विविधताओं को देख कर ही किसी ने इसे अचंभा कह कर पुकारा होगा जो बाद में अचंभा से चंबा हो गया। वैसे किदवंती है कि राजा साहिल वर्मा ने इस शहर को बसाया। राजा की पुत्री चंपावती के नाम पर चंबा पड़ा।
कला की नगरी कहलाने वाली चंबा घाटी को अतीत में यहाँ के कई कलाप्रिय राजाओं ने इस तरह संवारा कि इसकी ख्याति पूरे देश में फैल गई। इन राजाओं के काल में यहाँ की लोक कलाएं अत्याधिक विकसित हुई। यहाँ की वास्तुकला, भित्ति चित्रकला, काष्ठकला व मूर्तिकला अपने आप में बेजोड़ हैं। चंबा की कला ने पूरी दुनिया में अपनी एक विशेष पहचान बनाई। यहाँ के मंदिरों का शंखनाद, शहर का हराभरा चैगान, ढलवां छत वाले महलों का वास्तुशिल्प आने वालों का मनमोह लेते हैं।
यहाँ से डलहौजी के लिए भी रास्ता कटता है। लार्ड डलहौजी को यहाँ का सौंदर्य इतना भाया कि उन्होंने इसे अपना ठिकाना ही बना लिया। बस स्टैंड से उतरते ही यानी चंबा पहुंचते ही प्राचीन काल के रजवाड़ों की याद ताजा हो जाती है। यहां के प्राचीन रंगमहल व अखंडचंडी महल में घूमते हुए अतीत की तस्वीरें साफ-साफ देखी जा सकती है। चंबा के ग्रामीण लोग सीधे-सादे होते हैं। त्यौहार आदि अवसरों पर पूरी चंबा घाटी पहाड़ी संगीत और नृत्यों से गूंज उठती है।
चंबा पहुचते ही बसस्टैंड के पास विशाल मैदान है जिसे चैगान कहा जाता है। चैगान एक प्रसिद्ध व ऐतिहासिक स्थल है। चैगाना अरबी का शब्द है जिसका अर्थ है कि शहर के बीचोबीच हरे घास का मैदान। चैगान चंबा की सांस्कृतिक व सामाजिक गतिविधियों का भी मुख्य केन्द्र है। ऐतिहासिक मणि महेश की छड़ी यात्रा पर जाने वाले अधिकांश यात्री रात्रि को यहीं पर पड़ाव डालते हैं और प्रातः गंतव्य की ओर रवाना होते हैं। इसी मैदान में लगता है महीने भर चलने वाला मिंजर मेला।

मिंजर मेले के दौरान देश- विदेश से हजारों लोग यहां आते है। रात में चलने वाले इस उत्सव के दौरान देश के जाने-माने कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है। मेले में स्थानीय जनजाति युवक-युवतियों को परम्परागत वेशभूषा में मस्ती से डफली जैसा कुछ बजाते हुए नृत्य करते देखना एक अदभुत अनुभव है। मेले के दौरान लोग टोपी पहने कान पर एक विशेष प्रकार का धागा जिसमें कुछ परम्परागत सजावट की वस्तुएं होती है, टांगते हैं। चैगान के आसपास होटल उपलब्ध हैं। पास ही नदी बहती है जिसके किनारे किसी झरने के नीचे बैठकर नहाने के आनंद को स्वयं ही अनुभव किया जा सकता है।
कुछ दूरी पर एक पहाड़ी पगडंडी है जो चैमंुडा मंदिर की ओर ले जाती है। लकड़ी का बना यह मंदिर विश्व की संरक्षित धरोहर घोषित है। अपने प्रवास के दौरान हर सुबह अंधेरे ही सैंकड़ांे सीढ़ियां चढ़कर पुजारी के आने से पहले ही मैं मंदिर के सामने विशाल पत्थर पर जा बैठता। यहाँ से चंबा का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। आसपास फलों के बाग हैं जिनमें सेव, खुमानी, आडू प्रमुख हैं। धीरे-धीरे यहाँ की हरियाली को पत्थरों की अट्टालिकाएं निगल रही हैं जिसके कारण यहां का वातावरण प्रभावित हो रहा है। यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थलांे में शामिल हैं-
भूरी सिंह संग्रहालयµ यह देश के प्रमुख प्राचीन संग्रहालयों में एक है। शहर के ऐतिहासिक चैगान के सामने स्थित यह संग्रहालय विश्व भर के पर्यटकों, शोधार्थियों व कला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। इस संग्रहालय का निर्माण चंबा नरेश भूरी सिंह ने डच विद्वान डा. फोगल की प्रेरणा से करवाया था और वही इसके पहले संग्रहालयाध्यक्ष थे। यहाँ चंबा की पेंटिंग्स व रंगमहल में आग से क्षतिग्रस्त हुई दीवार के चित्र भी दिखाई देती हैं।
पनघट शिलाएंµ चंबा की कलात्मक धरोहरों में पनघट शिलाओं को भी शामिल किया जाता है। ये शिलाएं चंबा जनपद के ग्रामीण अंचलों में बनी बावड़ियों मंे व ‘नौणा’ जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों के किनारे आज भी देखी जा सकती हैं। इन शिलाओं के निर्माण के बारे मंे कहा जाता है कि यह 12वीं सदी के आसपास की हैं। ये शिलाएं पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।
रंगमहलµ चंबा के रंगमहल को देखने बड़ी तादाद में सैलानी आते हैं। रंगमहल में दीवार पर चित्रकारी के बेहतरीन नमूने सभी को प्रभावित करते हैं। रंगमहल परिसर में हिमाचल हस्तकला निगम का कार्यालय है। उसी भवन में एक इंपोरियम भी है जहाँ चंबा की कशीदाकारी और हस्तशिल्प के कई नमूने देखने को मिलते हैं। यहीं निपुण कारीगर तैयार करने के लिए काष्ठशिल्प प्रशिक्षण केन्द्र भी है।


अखंडचंडी महलµ चंबा को कलात्मक रूप से अधिक समृद्ध माना जाता है। अखंडचंडी महल चंबा की कलात्मक धरोहर का बेहतरीन नमूना है। यह महल ऐतिहासिक स्मारक होने के साथ साथ अनूठे वास्तु, स्थापत्य व चित्रकला के लिए भी प्रसिद्ध है। इसे कई राजाओं ने संवारा है।
खजियारµ चंबा से 24 किलोमीटर दूर बसा खजियार भारत के स्विट्जरलैंड के नाम से मशहूर है। खजियार अपनी हरियाली व शांत वातावरण के लिए भी पर्यटकों मे ंखासा लोकप्रिय है। यहाँ के ऊँचे-ऊँचे देवदार के वृक्ष पर्यटकों को आकर्षित करते हैं तो मंदिरों में किया गया लकड़ी का काम भी अपनी अद्भुत कारीगरी की दास्तान कहता है। यहां गोल्फ का आनंद लिया जा सकता है।
चंबा से 61 किमी दूर स्थित भरमौर को पहले ब्रह्मपुर के नाम से जाना जाता था। छठी व दसवीं शताब्दी में इसे भरमौर के नए नाम से पहचाना जाने लगा। कहा जाता है 10वीं शताब्दी में यहाँ 84 धर्मगुरू आए, इसीलिए राजा साहिल वर्मा ने उनकी स्मृति को अमर बनाने के लिए यहाँ 84 मंदिरों का निर्माण करवाया। भरमौर से ही कुग्ती व चोबियां पास भी घूमने जाया जा सकता है जो यहाँ से 65 किलोमीटर की दूर पर स्थित हैं। चंबा से मात्र 11 किलोमीटर दूर स्थित सरोल सुंदर गार्डन, पक्षीशाला तथा भेड़ प्रजनन केन्द्र के कारण पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। पिकनिक के लिए प्रसिद्ध इस स्थान को प्रकृति की सुंदर कारीगरी का नमूना कहा जा सकता है।
समुद्र तल से 1,829 मीटर की ऊंचाई पर बसा सलूनी चंबा से मात्र 20 किलोमीटर की दूर पर है। बर्फ से लदी चोटियों के मनोरम दृश्य, ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के जंगल और स्वच्छंद विचरण करते पक्षी व उनका कलरव यहाँ की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।
चंबा के आसपास और भी बहुत कुछ है लेकिन पर्यटकों की बढ़ती संख्या, उसपर अनियोजित विकास ने यहाँ के पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया है। सिकुड़ती हरियाली, शुद्ध वायु का अभाव किसी भी पर्वतीय स्थल के आकर्षण को कम कर देता है। लगातार वर्षों चंबा जाने वाले इन पंक्ंितयों का लेखक अपने मन में चंबा की उन हरी-भरी यादों को संजोये हुए आज बढ़ती आयु, घुटनों के दर्द से ज्यादा दर्द चंबा के बिगड़ते स्वरूप को लेकर है। प्रकृति की वाटिका को उजाड़ते हुए हम कब सोचंेगे कि यह आत्मघाती है? आखिर हम कब सीखंेगे प्रकृति से सामंजस्य बैठाना। पर्यावरण संरक्षण कब बनेगा हमारे संस्कारों का हिस्सा। यदि हम अब भी नहीं चेते तो चंबा जैसे खूबसूरत स्थलों की केवल यादें ही रह जाएगी।