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खतरनाक भी हो सकता है आवाज में भारीपन
January 27, 2019 • Dr. Ramesh Kumar Passi

आमतौर पर हम सभी जानते हैं कि जब कोई व्यक्ति सर्दी-जुकाम से पीड़ित हो तो वह ठीक से बोल नहीं पाता, आवाज़ के अन्दर एक प्रकार का रुखापन या भारीपन आ जाता है तथा बोलने में एक प्रकार की परेशानी उत्पन्न होने लगती है।

सरल शब्दों में आवाज़ में रूखापन एक सामान्य लक्षण है और यह समस्या छोटे रूप में शुरू होकर गम्भीर रूप धारण कर सकती है। अधिक बोलने अथवा गले में उत्पन्न खराश से आवाज में रूखापन आ जाता है। स्वास्थ्य परीक्षणों से आवाज में रूखापन का कारण कैंसर भी होना सामने आया है। आवाज में भारीपन के आते ही तुरंत सजग हो जाना चाहिए। लापरवाही खतरनाक भी हो सकती है।

हमारी आवाज एक यंत्रा से निकलती है जिसे स्वर यंत्रा कहा जाता है। यह यंत्रा गले के अगले हिस्से में होता है। गले के अगले हिस्से पर हाथ रखने से एक हड्डी उभरी-सी महसूस होती है जो कुछ भी निगलते समय ऊपर-नीचे होती है। इसे ही स्वरयंत्रा कहा जाता है।

यह छोटा-सा यंत्रा हड्डियों का बना होता है और इसमें दो अच्छे तन्तुपट होते हैं। इन्हीं से स्वर निकलते हैं। इन्हें स्वरनलिका भी कहा जाता है। स्वर नलिका की लम्बाई एवं तनाव के कम-ज्यादा होने से स्वरों में उतार-चढ़ाव आते हैं।

आवाज में रूखापन या भारीपन स्वयं में कोई बीमारी न होकर किसी बीमारी का लक्षण ही माना जाता है। जब आवाज धीरे-धीरे निकले या परेशानी से निकले तो उसे रूखी आवाज कहा जाता है। ऐसा स्वर नलिका के कम्पन में विषमता के कारण होता है। यह विषमता थकान, संक्रमण या नलिका में अन्य बीमारियों के कारण हो सकती है। यह नाजुक नलिका किसी भी थोड़ी-सी गड़बड़ी के कारण ही प्रभावित हो जाती है।

स्वरनलिका में गड़बड़ी होते ही हल्की सूजन के साथ आवाज में बदलाव शुरू हो जाता है। इसका मुख्य कारण गले की खराश को ही माना जाता है। यह खराश स्वर यंत्रा के अधिक उपयोग अथवा लापरवाही के कारण उत्पन्न हो सकती है। उदाहरण के लिए चिल्लाना, भीड़ के समक्ष बिना माइक्रोफोन के भाषण देना, जोर-जोर से भजन-कीर्तन करना आदि के कारणों से भी स्वरयंत्रा पर प्रभाव पड़ता है।

आवाज में भारीपन का एक कारण संक्रमण भी माना जाता है। जब आवाज बैठने की शिकायत लम्बे समय तक रहे, तब यह गम्भीर रूप धारण कर सकती है। किसी भी प्रकार से गले पर चोट लगने, सर्दी लगने, अधिक जुकाम के कारण से भी आवाज में भारीपन आ जाता है।

स्वरनलिका को नियंत्रित करने वाली मांसपेशियां घायल हो जाए तो, स्वरनलिका ठीक ढं़ग से हिलने-डुलने के काबिल ही नहीं रह पाती। इसका प्रभाव भी आवाज पर पड़ता है। इन मांसपेशियों में अथवा इसके आसपास सूजन होने पर भी इसके रास्ते में अवरोध पैदा हो जाता है। इन विषमताओं का निदान रोगी की पूरी जानकारी लेकर ही किया जा सकता है।

आवाज में बार-बार भारीपन आना एक गम्भीर खतरे की सूचना हो सकती है। रोगी को ऐसे समय में चिकित्सक को दिखाने में देर नहीं करनी चाहिए। चिकित्सक को रोगी से विस्तार पूर्वक जानकारी लेकर ही उपचार करना चाहिए। समस्या किन स्थितियों में प्रारम्भ हुई है, इसकी जानकारी बहुत ही आवश्यक है।

गम्भीर स्थिति में रोगी को एंटीबायोटिक औषधि दी जाती है। गरम पानी में एक चुटकी नमक डालकर गरारे करते रहने से भी गले का भारीपन दूर होता है। इससे गला एवं मुंह साफ हो जाता है। बोलते समय आवाज को धीमा निकाला जाना चाहिए। रोगी को ठण्डे पानी, पेय पदार्थ, आइसक्रीम भी दी जा सकती है। गले पर गर्म कपड़ा या मफंलर लपेट लेना लाभदायक होता है।

अनेक शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि एंटीसेप्टिक औषधियां गले के भारीपन में कोई खास असरदार साबित नहीं होती हैं बल्कि उनमें पाया जाने वाला ‘मैथाल’ गले में और भी रूखापन पैदा कर देता है। अतएव जहां तक संभव हो आवाज के भारीपन में स्वयं से किसी अंग्रेजी औषधि का सेवन नहीं करना चाहिए। मुलहठी के चूर्ण को गर्म पानी के साथ लेते रहने से भी आवाज खुल जाती है।