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क्रोध का सेहत पर प्रभाव
April 20, 2019 • Tarun Kumar Nimesh

क्रोध एक स्वाभाविक मानसिक क्रिया है जो दिमाग में 'एंगर सेंटर' के उत्तेजित होते ही मानव की संवेदना में परिवर्तन ले आती है। इससे खून का संचार बढ़ जाता है, चेहरा तमतमा जाता है, मुट्ठियां भिंच जाती हैं और क्रोध से शरीर की दूसरी संवेदनाएं मंद पड़ जाती हैं।
इससे विवेक नष्ट हो जाता है। तभी तो कहते हैं कि यदि किसी से मूर्खतापूर्ण कार्य करवाना हो तो उसे क्रोध दिलवा दो, उसका विवेक कम हो जाएगा।
यदि आपकी भावनाओं और विचारों के विपरीत यदि कोई कार्य हो जो आप के अनुरूप हो तो सम्भवतः आपको क्रोध आ जाएगा। क्रोध आपके शरीर, दिल दिमाग और रूधिर संचार पर विपरीत प्रभाव डालता है।
कई लोग तो क्रोध से कांपने लगते हैं। कुछ बोला नहीं जाता। दिल का दौरा एवं लकवा आदि क्लेश, क्रोध, लड़ाई झगड़े का परिणाम भी हो सकते हैं। क्रोध ही परिवार में बहुत-सी लड़ाइयों का मुख्य कारण है। दुःखी पारिवारिक वातावरण का सेहत पर दूषित प्रभाव पड़ता है।
क्रोध को वश में करना एक कला है। थोड़ी सी कोशिश और चेष्टा से इस को वश में किया जा सकता है। परिस्थितियों को विवेक द्वारा सम्भाल लेना चाहिए। जहां विवेक समाप्त, वहीं क्रोध का आरंभ हो जाता है।
कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति सोलह कला सम्पूर्ण नहीं होता लेकिन क्रोध एक ऐसी भावना है जो थोड़ी-बहुत सब में होती है। बच्चे को भी छोड़ो, वह भी आपसे नाराज होकर अपना क्रोध प्रकट करेगा। क्रोध को एक ऋणात्मक भाव माना जाता है जो शरीर और मानसिकता के लिए हानिकारक है। कहते हैं दस मिनट के क्रोध से शरीर की इतनी ऊर्जा खर्च हो जाती है जितनी ऊर्जा से सारे दिन का कार्यकलाप चल सकता है।
क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है और मूढ़ता से स्मृति का नाश होता है। स्मृति का नाश होने से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से प्राणी स्वयं नष्ट हो जाता है। क्रोध एक यमराज है जो एक जीवित मानव को मृत-तुल्य कर देता है। शक्ति का हृस कर देता है। क्रोध एक क्षणिक पागलपन है जब सोचने समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है।
जो मानव क्रोधी पर क्रोध नहीं करता, उसे क्षमा कर देता है, वह क्रोधी की 'महासंकट' से रक्षा करता है। वह अपने को और क्रोधी को कई मुसीबतों से बचा लेता है। तभी तो कहते हैं, क्रोध बुद्धि का शत्रा है, क्रोध का स्वास्थ्य पर गहन प्रभाव पड़ता है। क्रोधित व्यक्ति का चेहरा मुरझा जाता है।
प्रातः से शाम तक आदमी काम करने से नहीं थकता जितना क्रोध के एक घण्टे में थक जाता है। प्रायः देखने में आता है कि क्रोध में कही गई बातें अंत में शांति से बैठकर सोचने से गलत और उल्टी मालूम पड़ती हैं। अतः ऋषि मुनियों ने तो यहां तक कहा है कि यदि आप क्रोध में हों तो बोलने से पूर्व दस तक गिनो, यदि आप बहुत क्रोध में हों तो आप सौ तक गिनती गिनो। क्रोध अपने आप शांत हो जाएगा।
क्रोध से बचने का उपाय क्या है? लोग तपस्या करते हैं, जप करते हैं, तीर्थ जाते हैं कि क्रोध, काम, लोभ, अहंकार-समाप्त हो सकें। कहीं भी जाने की जरूरत नहीं। इसका एकमात्रा उपाय है-'क्षमा'। क्षमा कर देने से व्यक्ति अपने दुश्मन पर भी विजय पा लेता है।
दूसरे का अपराध सहन करके अपराधी पर उपकार करना, यह क्षमा का गुण सबसे बड़ा गुण है। कबीर जी ने अपनी वाणी में खूब कहा है।
जहां दया तहं धर्म, जहां लोभ तहं पाप, जहां क्रोध तहं काल, जहां क्षमा तहं आप।
दया धर्म का मूल है। लोभ का अंत पाप है। क्रोध काल समान है और क्षमा ईश्वरीय गुण है। आप वृक्ष बनो जो अपने काटने वाले को भी छाया प्रदान करता है। अतः क्रोध को अपनाना अपनी सेहत एवं शरीर का हनन करना है। क्रोध को त्यागने से अनेक विपदाओं से बचा जा सकता है।