एक बहुमूल्य संस्कार है रक्तदान
August 28, 2019 • गौरव जैन

आज के आधुनिक और वैज्ञानिक युग ने जहां हमारे जीवन को अत्यंत सुखदायी व गतिशील बना दिया है, वहीं प्रतिदिन दुर्घटनायें न जाने कितनों के प्राण लेती हैं और कितने ही अपनी प्राण-रक्षा के लिये हस्पतालों में जीवन रूपी सांसों से संघर्ष कर रहे होते हैं। दूसरी ओर अनभिज्ञता, प्रदूषण और गिर रहे नैतिक मूल्यों के परिणामस्वरूप एक से बढ़कर एक घातक बीमारी ने लोगों को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। बहुत-सी बीमारियां जिनको हमने पहले कभी सुना भी न था, आज विकराल रूप धारण कर चुकी हैं जैसे कैंसर, एड्स, डेंगू, ड्राप्सी, हैपेटाइटस आदि।

इन बीमरियों, दिन-प्रतिदिन की दुर्घटनाओं और कई बड़े आप्रेशनों के लिये भारत में प्रतिवर्ष 80,00,000 यूनिट से भी अधिक रक्त की आवश्यकता पड़ती है और स्वैच्छिक रक्तदाताओं से केवल एक चैथाई यूनिट रक्त ही जुट पाता है। आप आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि कितने रोगी प्रतिवर्ष केवल समय पर रक्त न मिलने के कारण ही प्राणों से अकारण हाथ धो बैठते हैं।

प्रत्येक समय हर ब्लड गु्रप की निरंतर आवश्यकता रहती है। हमें हमेशा अपने आप को रक्तदान के लिये तैयार रखना चाहिए क्योंकि इंसान को केवल इंसान का ही रक्त दिया जा सकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति जिसकी आयु 16 से 60 वर्ष और वजन 45 कि.ग्रा. से अधिक हो, प्रत्येक तीन महीने बाद आसानी से रक्तदान कर किसी को जीवनदान दे सकता है।

आमतौर पर यह सुनने को अक्सर मिलता है कि मुझ में तो रक्त की कमी है, मैं कैसे रक्त दे सकता हूं? रक्तदान करने से पहले रक्त की कमी के लिये आपकी जांच की जाती है और उसके बाद उचित मात्रा में रक्त पाये जाने पर ही रक्तदान करवाया जाता है।
रक्तदान में केवल 5 से 10 मिनट तक लगते हैं। इससे शरीर पर किसी तरह का कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। हम रक्तदान के बाद अपने सारे कार्य दिनचर्या अनुसार पुनः आम दिनों की भांति ही कर सकते हैं।

बस एक बार अपने मन को तैयार करने की आवश्यकता है, फिर आपका भय दूर हो जायेगा। यहां पर इस बात का ध्यान रखना अति अनिवार्य है कि स्वैच्छिक रक्तदान से अधिक सुरक्षित स्वैच्छिक रक्तदान पर बल देने की अधिक जरूरत है।