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अनेक समस्याओं का समाधान है विवाह
February 3, 2019 • Nirbhay Nimesh

विवाह स्त्री-पुरूष के बीच संबंधों का आदान-प्रदान तथा जीवन-भर का एक समझौता होता है। यह एक सामाजिक बन्धन है। जब एक स्त्री और पुरूष वैवाहिक बन्धन में बंधते हैं तो उन्हें एक-दूसरे से कुछ अपेक्षाएं होती हैं। इस बन्धन के बाद कुछ पाना और कुछ खोना ही होता है। परस्पर विश्वास, सहयोग, समर्पण, प्रेम तथा आपसी समझदारी के सहारे ही वैवाहिक बन्धन टिका रह सकता है।

इसमें कोई शक नहीं कि विवाह के बाद अनेक समस्याएं निश्चित तौर पर आती ही हैं क्योंकि विवाह केवल दायित्वों का निर्वाह ही नहीं होता बल्कि ’प्रेम‘ रूपी झरने को प्रवाहित करते रहना भी उसका मकसद होता है। प्रेम रूपी प्रवाह की शीतलता से न सिर्फ पति-पत्नी ही बल्कि सम्पूर्ण परिवार को शीतल बनाये रखना भी विवाह का उद्देश्य होता है। विवाह सामाजिक सुरक्षा की भावना प्रदान करता है। विवाह के बाद यह महसूस होने लगता है कि इतने बड़े संसार में कोई तो अपना कहलाने वाला है जो जीवन पर्यन्त दुःख-सुख का साथी है।

विवाहित युगल विशेषकर प्रेम-विवाह करने वाले विवाह को खेल समझते हैं। उनमें अक्सर हनीमून की खुमारी उतरते ही शिकवे शुरू हो जाते हैं।

जो लोग विवाह से बहुत सारी उम्मीदें पाल लेते हैं, वे ही जल्द निराश भी होते हैं। दायित्वों को निबाहने में अकुशल व परस्पर दोषारोपण कर प्रायः विवाह को विघटन के कगार तक ही पहुंचाकर दम लेते हैं। क्या नौकरी करने वाली युवती को अपने कार्यालय का दायित्व नहीं संभालना पड़ता? क्या दायित्व निर्वहण में त्रुटि होने पर वह उसका दोष अपने अधिकारी के मत्थे मढ़ देती है? जिस प्रकार अपने कार्यालय के दायित्वों को सम्भालने के लिए प्रयत्नशील रहना होता है, उसी प्रकार वैवाहिक दायित्वों को भी संभालने के लिए पति-पत्नी दोनों को ही प्रयत्नशील रहना चाहिए।

कल्पनाओं की उड़ान को धरातल तक ही सीमित करके यदि धैर्यपूर्वक परस्पर सामंजस्य की भावना विकसित की जाये तो विवाह प्रगति में बाधक नहीं हो सकता। विवाह प्रगति में बाधक नहीं बल्कि सहायक ही होता है। अपनी नौकरी में व्यक्ति को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है, उनका मुकाबला करना पड़ता है और फिर परिस्थितियों को अपने अनुकूल करके वह आत्म-सुख पाता है। फिर यही नजरिया वैवाहिक जीवन के प्रति क्यों न हो?

विवाह का दूसरा पक्ष शारीरिक भूख को शान्त करना भी है। यह यौन आवश्यकताओं की पूर्ति का सबसे सुरक्षित तथा समाज द्वारा स्वीकृत माध्यम है। विवाह द्वारा ही नारी को मातृत्व की प्राप्ति होती है। आज की नारी की विवाह न करने या देर से करने की धारणा क्या इन सत्य को झुठला सकती है?

आज की युवा पीढ़ी सफलता के चाहे जितने आयाम क्यों न छू ले, किंतु उसे समझना चाहिए कि अकेले जीवन यापन कठिन और नीरस होता है। एक-दूसरे के ऊपर निर्भर होना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन नहीं है क्योंकि स्त्री तो शक्ति का वह स्तम्भ है, जिसके आधार पर घर-परिवार का भवन खड़ा होता है। जब एक स्त्री को स्त्री तथा मां के दायित्वों को वहन करना होता है, तभी वह पूर्णता प्राप्त कर पाती है।